आध्यात्मिक_ज्ञान

साधकों

 सांसारिक भोगों को बाहर से भी भोगा जा सकता है और मन से भी। बाहर से भोग भोगना और मन से उनके चिंतन का रस (सुख) लेना- दोनों में कोई फर्क नहीं है। 

 बाहर से राग पूर्वक भोग भोगने से जैसा संस्कार पड़ता है, वैसा ही संस्कार मन से भोग भोगने से अर्थात् मन से भोगों के चिंतन में रस लेने से पड़ता है। 

भोग की याद आने पर उसकी याद से रस लेते हैं तो कई वर्ष बीतने पर भी वह भोग ज्यों का त्यों (ताजा) बना रहता है। अतः भोग के चिंतन से भी एक नया भोग बनता है।

हरि ॐ तत्सत
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