Laal maszid
मुगल साम्राज्य का इतिहास समेटे हुए है तिजारा की लाल मस्जिद
यूं तो समूचे भारत में मुगल साम्राज्य के दौरान निर्मित कई ऐतिहासिक धरोहरें हैं जो आज भी अतीत के स्वर्णकाल के इतिहास को अपने पन्नों में समेटे हुए हैं। राजस्थान में भी मुगलिया शासन के वक्त कई मस्जिदों का निर्माण करवाया गया। इन्हीं मस्जिदों में से एक ऐतिहासिक मस्जिद भी है जो अलवर जिले के उत्तर पश्चिम स्थित तिजारा नगर में है। तिजारा नगर महाभारत में त्रिगर्त के नाम से प्रसिद्ध था। यहीं पर बनी लाल मस्जिद भी अपना महत्व रखती है। यह मस्जिद मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के पुत्र मिर्जा हिन्दाल ने बनवाई थी। बाबर ने सन् 1531 में अपने पुत्र मिर्जा हिन्दाल को अलवर एवं तिजारा का शासक घोषित किया था, लेकिन मिर्जा हिन्दाल ने 1540 तक ही अलवर व तिजारा पर शासन किया था। अपने शासन काल की अल्पावधि में ही उसने अनेक ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण कराया था, जिसमें तिजारा की खूबसूरत लाल मस्जिद भी एक है। इस मस्जिद में बने तीनों कक्ष आपस में जुड़े हुए हैं। मस्जिद के भीतर प्रवेश करने पर समूची इमारत एक ही परिसर की भांति दिखाई देती है। इसके मुख्य कक्ष एवं उत्तरी कक्ष ऊपर से विशाल अष्टकोणीय गुम्बद से ढके दिखाई देते हैं। कहा जाता है कि दक्षिणी कक्ष का गुम्बद निर्माण कार्य में बाधा आने से रुक गया था, जिससे यह अधूरा ही रह गया और ऊपर से खुला दिखाई देता है। मस्जिद की भीतरी दीवार कलात्मक मेहराबदार आकृतियों से सुसज्जित है। सामने की तरफ बने मुख्य दरवाजों के दोनों तरफ लाल-पत्थर की खिड़कियां काफी ऊंचाई पर बनी हुई हैं। आश्चर्य की बात यह है कि मुख्य दरवाजे तक निर्मित दीवार इस तरह से बनी हुई है कि वह बाहर से दिखाई तक नहीं देती है। मस्जिद का भीतरी भाग रोशनीयुक्त व हवादार है तो दीवारों पर बनी खिड़कियां व इनके साथ ही बाहर दिखाई देने वाली लाल पत्थर से निर्मित छतरियां शिल्पकारी का बेजोड़ नमूना हैं। मस्जिद के भीतर दीवारों में दीपक रखने के आले भी मनोहारी हैं। मस्जिद का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर है। मस्जिद की प्रथम मंजिल तीन भागों में विभक्त है। इसमें तीन मेहराबें भी हैं। कुल मिलाकर मस्जिद में नौ द्वार बने हुए हैं। मस्जिद की मुख्य इमारत दूसरी मंजिल पर बनी हुई है। मस्जिद में प्रवेश हेतु मुख्य द्वार ही है। हालांकि प्रत्येक द्वार से जुड़ा एक-एक कक्ष है। मस्जिद की भव्य मीनारें भी देखने लायक हैं। ऐतिहासिक लाल मस्जिद अपनी विशिष्ट कला के लिए भी जानी जाती है जो 16वीं शताब्दी की मूक साक्षी है। 'राष्ट्रीय महत्व' का दर्जा पा चुकी इस मस्जिद के साथ एक दु:खद पहलू यह भी है कि जब इसका निर्माण कार्य चल रहा था तब शेरशाह सूरी ने तिजारा के शासक मिर्जा हिन्दाल को शहर छोडऩे पर मजबूर कर दिया था जिससे यह मस्जिद पूर्ण रूप न ले पाई। भले ही इस धरोहर को 'लाल मस्जिदÓ के नाम से पुकारा जाता है, लेकिन इसमें लाल पत्थर का उपयोग मात्र दरवाजों और खिड़कियों में किया गया है जबकि शेष इमारत चूने और पत्थर से निर्मित है। तिजारा स्थित लाल मस्जिद की सार-संभाल व मरम्मत कार्य राज्य सरकार के अधीन है। वक्त के थपेड़ों ने भले ही इसका बाहरी आकर्षण कम कर दिया है, लेकिन इमारत देखकर अंदाज लगाया जा सकता है कि यह भी कभी बुलंद रही होगी।
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